भारत की सुरक्षा क्षमताओं को बेहतर बनाने की दिशा में अमेरिका ने हाल ही में एक बड़ा कदम उठाया है। अब भारत को अमेरिका से FGM-148 जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल मिलेंगी, जिसकी कीमत करीब 45.7 मिलियन डॉलर तय की गई है। इस सौदे में 100 जैवलिन मिसाइलें और दर्जनों लॉन्च यूनिट्स के साथ 216 एक्सकैलिबर प्रोजेक्टाइल भी शामिल हैं। इस कदम से भारतीय सेना को आधुनिक टैंक विरोधी क्षमता, सटीक निशाना, और ऊंचाई वाले इलाकों में युद्ध के लिए शानदार तकनीक मिल रही है।
जैवलिन मिसाइल की उत्पत्ति और विकास
FGM-148 जैवलिन एक अमेरिकी मैन-पोर्टेबल (सैनिक अपने साथ ले जाने योग्य) एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम है, जिसे टैंक और भारी बख्तरबंद वाहनों को तबाह करने के लिए डिजाइन किया गया था। इसकी शुरुआत 1980 के दशक में अमेरिकी सेना की ‘टैंक ब्रेकर प्रोग्राम’ के तहत हुई। इसका पहला सफल टेस्ट 1991 में हुआ और 1996 से यह अमेरिकी सेना में सेवा में आ गई। इसे बनाने वाली कंपनियाँ Raytheon और Lockheed Martin हैं, जो विश्व की अग्रणी रक्षा कंपनियाँ हैं।
जैवलिन की खासियतें
- फायर-एंड-फॉरगेट टेक्नोलॉजी: यानि जैसे ही सैनिक मिसाइल लॉन्च करता है, उसे वहीं खड़ा रहकर निशाना नहीं साधना पड़ता; मिसाइल खुद-ब-खुद लक्ष्य को ढूंढ़कर खत्म करती है। सैनिक तुरंत कवर ले सकता है जिससे उसकी सुरक्षा बढ़ जाती है।
- टॉप-अटैक प्रोफाइल: ये मिसाइल ऊँचाई से हमला करती है, जहां टैंकों की सुरक्षा कमजोर होती है।
- तांडेम चार्ज वारहेड: जैवलिन एक डबल वारहेड इस्तेमाल करती है; पहला चार्ज टैंक की एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर को डिटोनेट करता है, दूसरा मुख्य चार्ज मुख्य आर्मर को भेदता है।
- रेंज और सटीकता: इसकी अधिकतम रेंज लगभग 2.5 से 4 किलोमीटर तक है, और कंप्यूटर गंाइडेंस की वजह से निशाना बेहद सटीक रहता है।
- इन्फ्रारेड गाइडेंस: इसकी क्लू यूनिट थर्मल इमेजिंग पर काम करती है, जिससे रात में या छुपे हुए लक्ष्यों को भी साधा जा सकता है।
- सॉफ्ट लॉन्च में केपेबिलिटी: मिसाइल पहले धीमी गति से लांचर से बाहर जाती है और फिर मुख्य इंजन स्टार्ट होता है; जिससे सैनिक का पता लगना मुश्किल होता है।
- मल्टीपर्पज यूज: न सिर्फ टैंकों के लिए, बल्कि गुफाओं, इमारतों, और बंकरों को भी यह मिसाइल आसानी से तबाह कर सकती है।
किस-किस देश के पास है जैवलिन?
यह मिसाइल अमेरिका समेत ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, नॉर्वे, लिथुआनिया, यूक्रेन, ताइवान, सऊदी अरब, जॉर्डन, ओमान, कतर, न्यूजीलैंड, ग्रीस सहित 20 से ज्यादा देशों की सेनाओं में शामिल है। हाल ही में भारत, थाईलैंड, रोमानिया, मोरक्को जैसे देश भी इसे हासिल कर रहे हैं।
कहां-कहां हुआ है इस्तेमाल?
जैवलिन ने पहली बार 2003 में इराक युद्ध में भाग लिया और कई टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों को सफलतापूर्वक तबाह किया। अफगानिस्तान और सीरिया में भी इसका उपयोग हुआ और हाल ही में यूक्रेन-रूस युद्ध में तो इसका नाम सोशल मीडिया पर ‘Saint Javelin’ जैसे सिम्बल के साथ चर्चा में आया। यूक्रेन के सैनिकों ने बड़ी संख्या में रूसी टैंकों को जैवलिन की मदद से ध्वस्त किया और अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार शुरुआती फायरिंग में 90% से ज्यादा हिट रेट रही हैl
जैवलिन को रोकने के उपाय
जैवलिन जैसी मिसाइलों को रोकना टैंकों के लिए आसान नहीं है क्योंकि ये ऊपर से हमला करती हैं। बचाव में:
- एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर: लेकिन जैवलिन तांडेम वारहेड की वजह से इन्हें भी बेअसर कर देती है।
- स्मोक या IR स्मोक: टैंक अपने चारों तरफ धुंआ छोड़ते हैं जिससे इन्फ्रारेड गाइडेंस गड़बड़ा जाती है।
- लेजर डैज़लर्स और जैमर्स: ये मिसाइल की ट्रैकिंग को बाधित करते हैं।
- IR Emitters: टैंक मिसाइल के सेंसर को भटकाने के लिए इन्फ्रारेड एमिटर एक्टिवेट कर सकते हैं l
भारत की सेना के लिए नियंत्रण और असर
जैवलिन मिसाइल की आधुनिक तकनीक और सटीकता से भारतीय सेना का टैंक विरोधी बल अत्याधुनिक हो जाएगा। खासतौर पर चीन के साथ लद्दाख जैसी ऊँचे और कठोर इलाकों में जहां टैंक ऑपरेशन होते हैं, जैवलिन भारतीय सेना को दुश्मन के टैंक को 2.5 से 4 किलोमीटर दूर से आसानी से नष्ट करने की ताकत देगा। ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ टेक्नोलॉजी और सॉफ्ट लॉन्च सिस्टम से भारतीय सैनिक युद्ध के दौरान ज्यादा सुरक्षित रहेंगेl
दुश्मन पर असर
जैवलिन मिसाइल की मौजूदगी से दुश्मन की सेना—खासकर उसके बख्तरबंद टैंक—हमारे आगे कमजोर पड़ जाएंगी। किसी भी टैंक आधारित रणनीति को काउंटर करने के लिए अब भारतीय सेना के पास सबसे आधुनिक हथियार होगा, जिससे दुश्मन को हर हमला पहले से ज़्यादा मुश्किल और जोखिम वाला लगेगा l
निष्कर्ष:
जैवलिन मिसाइल की खरीद सिर्फ एक रक्षा डील नहीं बल्कि भारतीय सेना को नई शक्ति, नई सटीकता और आधुनिक वार क्षमता देने वाली क्रांतिकारी तकनीक है। इससे न केवल सरहदों की रक्षा मजबूत होगी बल्कि भारत को वैश्विक स्तर पर सामरिक प्रतिष्ठा भी मिलेगी। ये मिसाइल विश्व के पूर्व ग्रेट गन सिस्टम्स से कहीं अधिक एडवांस है, और भारतीय जवानों के लिए एक नई सुरक्षा कवच साबित होl

