डोनाल्ड ट्रंप की ऐतिहासिक वापसी: 2024 अमेरिकी चुनाव, विवाद और भारत पर असर
अमेरिका ने एक बार फिर इतिहास रचा है। 2024 के राष्ट्रपति चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप ने जोरदार वापसी की है। इस बार उन्होंने न केवल 47वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने की तैयारी कर ली है, बल्कि उनकी रिपब्लिकन पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सेनेट दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि लगभग 20 साल बाद पहली बार किसी रिपब्लिकन उम्मीदवार ने पॉपुलर वोट भी जीता है। यानी इस बार अमेरिकी जनता ने भी ट्रंप को साफ-साफ समर्थन दिया।
लेकिन इस नतीजे का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देगी – और खासतौर पर भारत पर।
अमेरिकी चुनाव प्रणाली: भारत से अलग कैसे?
अमेरिका और भारत दोनों ही लोकतांत्रिक देश हैं, लेकिन चुनाव प्रणाली पूरी तरह अलग है।
- हर 4 साल बाद नवंबर के पहले मंगलवार को चुनाव होते हैं।
- जनता राष्ट्रपति, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सेनेट – तीनों के लिए वोट करती है।
- राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता के वोट से नहीं, बल्कि इलेक्टोरल कॉलेज (538 इलेक्टर्स) से होता है।
- राष्ट्रपति बनने के लिए कम से कम 270 इलेक्टोरल वोट जरूरी हैं।
यही वजह है कि कई बार ऐसा होता है कि जिसे जनता से ज्यादा वोट मिलते हैं (पॉपुलर वोट), वह राष्ट्रपति नहीं बन पाता। उदाहरण के लिए, 2016 में हिलेरी क्लिंटन को डोनाल्ड ट्रंप से ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन ट्रंप राष्ट्रपति बने।
सेनेट और सुप्रीम कोर्ट की ताकत
अमेरिकी राजनीति में सेनेट बेहद ताकतवर है।
- यह राष्ट्रपति के द्वारा नामित जजों और सुप्रीम कोर्ट जस्टिस की पुष्टि करता है।
- ट्रंप के पहले कार्यकाल में रिपब्लिकन बहुमत की वजह से सुप्रीम कोर्ट में कई कंज़र्वेटिव जज नियुक्त हुए।
- इसका असर ऐसे फैसलों पर दिखा, जैसे रो बनाम वेड (Abortion Rights) का पलटना।
2024 में रिपब्लिकन पार्टी का सेनेट पर नियंत्रण आने वाले वर्षों में अमेरिकी समाज को और कंज़र्वेटिव नीतियों की ओर ले जा सकता है।
ट्रंप और उनके कानूनी विवाद
डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के इतिहास में पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्हें 34 मामलों में दोषी ठहराया गया है।
- यह केस फर्जी बिजनेस रिकॉर्ड्स और “हश मनी” से जुड़ा है।
- अदालत ने उनकी सजा पर फैसला 26 नवंबर 2024 को सुनाने की तारीख तय की है।
बड़ा सवाल यह है कि अगर उन्हें जेल की सजा मिलती है तो क्या वह राष्ट्रपति रहते हुए खुद को माफ़ (Pardon) कर पाएंगे? अमेरिकी संविधान में इसकी अनुमति है, लेकिन राजनीतिक बहस तेज है।
भारत-अमेरिका संबंध: ट्रंप के लौटने का असर
1. इमिग्रेशन और H1B वीज़ा
- ट्रंप हमेशा से illegal immigration के खिलाफ रहे हैं।
- लेकिन उनके कार्यकाल में legal immigration भी आसान नहीं रहा।
- H1B वीज़ा, जिस पर लाखों भारतीय IT इंजीनियर और प्रोफेशनल निर्भर हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ।
- 2016 में H1B रिजेक्शन रेट 6% था।
- 2018 में बढ़कर 24% हो गया।
- ट्रंप H1B को “अमेरिका की समृद्धि की चोरी” तक कह चुके हैं।
- वहीं, फैमिली री-यूनिफिकेशन के लिए वीज़ा प्रक्रिया भी उनके कार्यकाल में लंबी हो गई थी।
इसलिए भारतीय प्रोफेशनल्स को एक बार फिर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
2. व्यापार और आर्थिक संबंध
- ट्रंप की “America First” नीति का सीधा असर भारत-अमेरिका व्यापार पर पड़ा।
- उन्होंने भारत पर कई बार आरोप लगाया कि वह अमेरिकी कंपनियों को मार्केट एक्सेस नहीं देता।
- उदाहरण के तौर पर Harley Davidson मोटरसाइकिल्स – जिन पर भारत ने ज्यादा इंपोर्ट ड्यूटी लगाई थी।
- ट्रंप ने इस पर खुलकर कहा था कि भारत उनके देश के साथ “अनुचित व्यवहार” कर रहा है।
दूसरी ओर, बाइडन सरकार के समय भारत-अमेरिका व्यापार तेज़ी से बढ़ा।
- 2020 से 2024 के बीच भारत का अमेरिका को निर्यात 46% बढ़ा।
- जबकि अमेरिका से आयात केवल 17.9% बढ़ा।
ट्रंप के लौटने के बाद भारत पर ट्रेड टैरिफ का दबाव बढ़ सकता है।
3. रणनीतिक और सुरक्षा संबंध
- इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का बढ़ता दबदबा अमेरिका और भारत दोनों के लिए चुनौती है।
- ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में क्वाड (Quad) जैसे ग्रुप्स का समर्थन किया था।
- संभावना है कि उनकी वापसी से रक्षा सहयोग, टेक्नोलॉजी साझेदारी और इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी और मजबूत हो।
निष्कर्ष: भारत के लिए चुनौती और अवसर
डोनाल्ड ट्रंप की वापसी सिर्फ अमेरिका की राजनीति नहीं बदलने वाली, बल्कि दुनिया के समीकरण भी बदलेंगी।
- भारत के लिए H1B वीज़ा और व्यापारिक टैरिफ चुनौती साबित हो सकते हैं।
- लेकिन रक्षा, सुरक्षा और टेक्नोलॉजी सहयोग में अवसर भी मिल सकते हैं।
भारत को अब ट्रंप की नीतियों के बीच संतुलन बनाना होगा। अगले चार साल दोनों देशों के रिश्तों की असली परीक्षा होंगे।